गेंदामल हलवाई का चुदक्कड़ कुनबा-57

सम्पादक : जूजा जी
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जैसे ही कुसुम के कमरे का दरवाजा बंद हुआ.. चमेली तेज़ी से रसोई में से निकल कर राजू के कमरे की तरफ चल पड़ी। राजू के कमरे का दरवाजा खुला हुआ था और अन्दर लालटेन जल रही थी।
अन्दर लेटा हुआ.. राजू चमेली को अपने कमरे की तरफ आ हुए देख रहा था और फिर चमेली ने अन्दर आते ही.. जल्दी से दरवाजा बंद किया और राजू की तरफ हसरत भरी नज़रों से देखने लगी।
राजू चारपाई से उठा और चमेली को अपनी बाँहों में भरते हुए.. उसके होंठों को अपने होंठों में भर लिया।
चमेली किसी बेल की तरह राजू से लिपट गई और दोनों के होंठों के बीच घमासान शुरू हो गया।
पूरे कमरे में ‘ओह्ह..आह्ह..’ की आवाज़ें गूँज रही थीं।
राजू के हाथ चमेली के पेट से नीचे की ओर सरकते हुए.. उसके मोटे-मोटे चूतड़ों पर आ चुके थे। राजू चमेली के होंठों को चूसते हुए.. उसके भारी और मोटे चूतड़ों को अपने दोनों हाथों में भर कर मसलने लगा।
चमेली उसकी बाँहों में पागलों की तरह छटपटाने लगी। राजू ने अपने होंठों को चमेली के होंठों से अलग किया और अपना पजामा उतार कर चारपाई पर नीचे पैर लटका कर बैठ गया। उसका 8 इंच का लण्ड हवा में झटके खा रहा था।
उसका 8 इंच लंबा और 3 इंच मोटा लण्ड देख कर चमेली की चूत की फाँकें फुदकने लगीं.. वो तेज़ी से राजू के पास आकर पैरों के बल नीचे ज़मीन पर बैठ गई और उसके लण्ड को हाथ में लेकर राजू के आँखों में देखते हुए बोली।
चमेली- आह राजू.. मेरी चूत का बुरा हाल था.. तेरे लण्ड के बिना…।
और अगले ही पल चमेली ने राजू के लण्ड को अपने होंठों में भर लिया और उसके लण्ड के सुपारे पर अपने होंठों को दबाते हुए.. उसके लण्ड को चूसने लगी।
राजू मस्ती में आकर पीछे के तरफ लुढ़क गया। अब भी उसके पैर चारपाई से नीचे लटक रहे थे।
चमेली तेज़ी से राजू के लण्ड को अपने मुँह में अन्दर-बाहर करते हुए चूस रही थी.. उसने जल्दी से अपनी चोली खोल कर नीचे ज़मीन पर गिरा दी।
फिर राजू के लण्ड को मुँह से बाहर निकाला और चारपाई के किनारे पर राजू की जाँघों के दोनों तरफ पैर रख कर बैठते हुए अपने लहँगे को अपनी कमर तक उठा लिया।
फिर उसने राजू के लण्ड को एक हाथ से पकड़ कर अपनी चूत के छेद पर टिका कर धीरे-धीरे लौड़े के ऊपर बैठने लगी। राजू के लण्ड का सुपारा चमेली की गीली चूत के छेद को फ़ैलाता हुआ अन्दर घुसने लगा।
चमेली के पूरे बदन में मस्ती की लहर दौड़ गई और उसने आगे की ओर झुकते हुए.. अपनी गाण्ड को ज़ोर से नीचे के तरफ पटका.. गीली चूत में राजू का लण्ड सरसराता हुआ.. अन्दर जा घुसा..।
“ओह राजूऊऊ आह्ह.. सस..इई”
चमेली राजू के लण्ड की गरमी को अपनी चूत में महसूस करके सिसक उठी।
चमेली मस्ती में आकर तेज़ी से अपनी गाण्ड को ऊपर-नीचे करने लगी।
राजू अपनी आँखें बंद किए हुए चुदाई का मज़ा ले रहा था।
चमेली का पूरा बदन चूत में लण्ड की रगड़ को महसूस करते हुए काँप रहा था.. पर वो लगातार अपने धक्कों को जारी रखे हुए थी।
थोड़ी देर बाद राजू ने चमेली को अपने ऊपर से उठने के लिए कहा और जैसे ही चमेली उसके ऊपर से उठी.. चूत में से पानी से भीगा हुआ लण्ड बाहर आकर लालटेन की रोशनी में चमकने लगा।
“आह.. क्या गरम चूत है काकी.. तुम्हारी.. इतनी बड़ी बेटी हो गई है.. और देखो अभी भी कुँवारी छोकरी की तरह पानी की नदियां बहा रही है”
राजू की बात सुन कर चमेली एकदम से शर्मा गई.. पर अभी तो उसकी चूत की अन्दर आग लगी हुई थी.. वो चारपाई पर पीठ के बल लेट गई और अपनी जाँघों को पूरा खोल कर फैला दिया।
राजू जल्दी से उसकी जाँघों के बीच में आया और उसकी टाँगों को घुटनों से पकड़ कर मोड़ कर ऊपर उठा दिया।
इससे उसकी चूत का छेद खुल कर सामने आ गया और अगले ही पल राजू ने अपने लण्ड के सुपारे को चूत के छेद पर टिका कर जोरदार धक्का मारा।
“आह्ह..”
चमेली एकदम से सिसक उठी और फिर राजू ने बिना रुके.. ताबड़तोड़ धक्के लगाने शुरू कर दिया।
दनादन 5 मिनट के चुदाई के बाद राजू के लण्ड से वीर्य की बौछार चमेली की चूत में होने लगी और चमेली का बदन झड़ने के कारण झटके खाने लगा।
अगली सुबह जब राजू उठा.. तो वो अकेला अपने कमरे में चारपाई पर लेटा हुआ था। उसका पूरा बदन दर्द कर रहा था.. एक तो सफ़र की थकान और दूसरा रात को उसने चमेली के जबरदस्त चुदाई की थी।
राजू मन मार कर चारपाई से उठा और कमरे का दरवाजा खोल कर बाहर आ गया। जैसे ही राजू कमरे से बाहर आया.. तो मानो उसकी सारी थकान एक पल में उतर गई हो.. उसके होंठों पर एक लंबी मुस्कान फ़ैल गई।
उसके सामने दीपा खड़ी थी.. राजू और दीपा दोनों की नजरें आपस में मिलीं.. शायद दीपा अभी नहा कर गुसलखाने से निकली ही थी.. उसके बालों से पानी की टपकती बूंदें ऐसे लग रही थीं.. जैसे मानो मोती हों।
राजू उससे बात करने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा तो पीछे से उससे चमेली आती हुई दिखाई दी। अब राजू रुक तो नहीं सकता था.. इसलिए चलता हुआ.. वो घर के आगे की तरफ चला गया।
राजू खेतों में शौच के लिए गया और फिर आकर नहा-धो कर घर के सामने वाले आँगन में नास्ते के लिए नीचे फर्श पर बैठ गया। कुसुम वहीं पलंग पर बैठी हुई थी।
दीपा अपने कमरे में थी.. कुसुम ने वहीं से बैठे हुए.. चमेली को आवाज़ दी।
कुसुम- अरे ओ चमेली.. राजू के लिए नास्ता लगा दे..।
चमेली ने रसोई से कहा- जी मालकिन..
थोड़ी देर बाद चमेली राजू के लिए नास्ता लेकर आ गई और जैसे ही वो राजू को नास्ते की प्लेट देने के लिए झुकी थी.. दोनों ने एक बार एक-दूसरे की आँखों में देखा और रात की चुदाई के बारे में याद आते ही चमेली के होंठों पर कामुक मुस्कान फ़ैल गई।
पास में पलंग पर बैठी.. कुसुम उन दोनों को देख रही थी।
कुसुम- अरी रांड.. थोड़ा घी भी डाल देती.. इतनी मेहनत करवाती है लड़के से..
कुसुम के मुँह से यह सुन कर चमेली एकदम से झेंप गई.. पर चमेली भी कुसुम को करारा जवाब दिए बिना रह नहीं सकती थी।
चमेली- अरे हमारे ऐसे भाग कहाँ मालकिन.. ये बेचारा तो पिछले दो महीनों से तुम्हारे खेतों की ही तो जुताई कर रहा है।
कुसुम के दिल की धड़कनें चमेली की बात सुन कर और तेज हो गईं.. उसने पलट कर एक बार दीपा के कमरे की तरफ देखा और बोली। “कलमुँही.. धीरे नहीं बोल सकती क्या..? पता नहीं दीपा घर में है..”
कुसुम की फटकार सुन कर चमेली मुँह बिचकाते हुए रसोई में चली गई।
राजू खाना खा कर फिर से पीछे बने कमरे में चला गया।
चमेली रसोई का सारा काम खत्म कर चुकी थी और वो घर जाने ही वाली थी कि तभी कुसुम रसोई में आई।
कुसुम- सारा काम निपट गया ?
चमेली- जी मालकिन..।
कुसुम- अच्छा तो चल फिर आज मुझे अपनी काकी सास के घर जाना है… तू मेरे साथ चल.. बहुत दिन हो गए.. उनसे मिले हुए।
चमेली- जी चलिए…।
उसके बाद कुसुम दीपा को बता कर चमेली के साथ सास के घर चली गई। अब दीपा घर में राजू के साथ एकदम अकेली थी.. पर राजू घर के पीछे अपने कमरे में अकेला चारपाई पर लेटा हुआ था।
दीपा का दिल जोरों से धड़क रहा था.. हर पल उसके लिए काटना मुश्किल होता जा रहा था। पर राजू था कि दुनिया से बेसुध अपने उस कमरे मैं लेटा हुआ था।
करीबन आधा घंटा बीत चुका था.. दीपा को समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या करे। बार-बार उसका दिल राजू की और खिंचा चला जा रहा था.. उसके बदन के रोम-रोम में अजीब सी सनसनाहट दौड़ रही थी। दीपा एकदम से अपने बिस्तर से खड़ी हुई और उसके कदम अपने आप ही घर के पिछवाड़े की ओर बढ़ने लगे। धड़कते दिल और काँपते हुए पैरों के साथ हर पल उसे एक अजीब से बेचैनी का अहसास हो रहा था। जैसे ही वो घर के पिछवाड़े में पहुँची.. तो उसने राजू के कमरे का दरवाजा बंद पाया।
वो गुसलखाने की तरफ़ बढ़ने लगी.. पर निगाहें राजू के कमरे के दरवाजे पर गड़ी हुई थीं। तभी दीपा ज़ोर से किसी चीज़ से टकराई और जैसे ही वो गिरने को हुई.. तो किसी ने उसे थाम लिया। दीपा की आँखें डर के मारे बंद हो गई थीं।
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एक लम्बी कथा जारी है।

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